प्रेमचंद की आँखें

By Yuvraj Sinha

(1/08/2020 00:30IST)

एक दिन हिंदी के एक अखबार को उलट-पलट रहा था तभी अखबार के बीच के पन्ने पर मुंशी प्रेमचंद की एक बड़ी-सी तस्वीर आ खुली। पृष्ट पर प्रेमचंद की एक कहानी भी साथ में छपि हुई थी। कहानी पहले पढ़ चूका था तो कोई ज़्यादा ध्यान न दिया उस पे, पर जिस चीज़ ने सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा वो था प्रेमचंद का वो चित्र और उसमे बानी उनकी आँखे। कागज़ी चित्र में भी उनकी आँखें चमकती सी जान पड़तीं थीं, चित्रकार की कलम का कमाल ही रहा होगा वो। लेकिन उनकी आँखें उदास सी जान पड़ती थीं, कुछ निराश, कुछ हताश। कुछ बोल सी रहीं थीं उनकी आँखे। कुछ पूँछ रही थीं। "क्यों मेरी सोच को, मेरे सपनों को भुला दिया तुमने?" ये सवाल पूछती सी मालूम होती थीं।

उन आँखों में उदासी तो थीं, पर चमक भी थीं, जो उस उदासी से मेल न खातीं थीं। उदासी थी, अपनी सोच को, अपनी क्रन्तिकारी विचारधारा को, केवल किताबों तक सिमटा हुआ देखने का दुःख। उनके सपनो के ज़मीन पर न उतरने की उदासी। वो क्रांति जिसे कभी खुद उस उपन्यास सम्राट ने 'कर्मभूमि' में परिभाषित किया था, "ऐसी क्रांति जो सर्वव्यापक हो, जो जीवन के मिथ्या आदर्शों का, झूठें सिद्धांतों का, परिपाटियों का अंत कर दे, जो एक नए युग की प्रवर्तक हो, एक नयी सृष्टि खड़ी कर दे, जो मिट्टी के असंख्य देवताओं को तोड़-फोड़ कर चकनाचूर कर दे, जो मनुष्य को धन और धर्म के आधार पर टिकने वाले राज्य के पंजे से मुक्त कर दे।"

आज उसी लमही के लाल की कागज़ी तस्वीर तक की आँखें उदास हैं। मौजूदा धार्मिक अलगाव की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ये सब देख आज प्रेमचंद की आत्मा रोती होगी। कहाँ उन्होंने ऐसे भारत का सपना देखा था जहाँ धर्म एक नीजि चीज़, एक व्यक्तिगत चीज़ हो। जहाँ समाज का मुख्य आधार समानता और भाईचारा होंगे। लकिन आज की यथास्थिति किसी से छिपी नहीं है। आज हम कहाँ हैं, ये हम जानते हैं। कभी प्रेमचंद ने मज़हब के बारे में अपने ख्यालात अपने एक उपन्यास के एक किरदार के ज़रिये ज़ाहिर किए थें,"धर्म का काम संसार में मेल और एकता पैदा करना होना चाहिए। यहां धर्म ने विभिन्नता और द्वेष पैदा कर दिया है। क्यों खान-पान में, रस्म-रिवाज़ में धर्म अपनी टांग अड़ाता है? हम धर्म के बाहर किसी से आत्मा का सम्बन्ध भी नहीं कर सकतें। आत्मा को भी धर्म ने जकड़ रखा है, प्रेम को भी जकड़ रखा है। यह धर्म नहीं, धर्म का कलंक है।" आज लव-जिहाद पर लम्बी-लम्बी बकवास सुनकर प्रेमचंद की आत्मा को झटका ही लगता होगा। पर हम हैं की उनकी आत्मा के रोने के कारण बढ़ाते जा रहे हैं।

हमारे विद्यालय आज जब शिक्षा की दुकाने बने हुए हैं, तब क्या मुंशी जी की आत्मा शांत रहती होगी? जब आज हमारी सरकार सरकारी कॉलेजों को भी खुद पैसा कमाने को कहती है तब क्या प्रेमचंद की आत्मा तृप्त हो जाती है? नहीं। बिलकुल नहीं। "ऊँची-से-ऊचीं तालीम सबके लिए मुआफ हो, ताकि गरीब-से-गरीब आदमी भी ऊँचे-से-ऊँची लियाकत हासिल कर सके और ऊँचे-से-ऊँचा ओहदा पा सके। यूनिवर्सिटी के दरवाजें सब के लिए खुलें हों।" ये थी उनकी सोच शिक्षा के बारे में। उनकी इन बातों को हवा होते देख उनकी तस्वीर तक की आँखें उदास पद गयीं हैं। पर उनमे अभी भी उम्मीद की एक चमक है की सब बदलेगा और तुम उसे बदलोगे। अमीर-गरीब और धर्म का अंतर तुम मिटाओगे और सरकरों के मानसिक रूप से गुलाम नहीं बनोगे चाहे टीवी पर बैठकर कितनी भी पट्टी तुम्हें वो लोग सिखाएं या तुम्हें छले। उन आँखों में उम्मीद हैं तुमसे।

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Yuvraj Sinha

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