हुज़ूर, हमारी भी सुन लीजिए।

By Yuvraj Sinha

(21/09/2020 18:00 IST)

आज से कुछ दिन पहले #SSCandRailway ट्विटर और फेसबुक पर ट्रेंड करने लगा था और साथ ही साथ एक मगही गीत भी वायरल होने लगा जो की रामानंद सागर की 'रामायण' के एक गीत पर आधारित है जिसके बोल कुछ इस प्रकार हैं, "हम कथा सुनते रिजल्ट्स के इंतज़ार की, ये करुण पुकार है हम सब बेरोज़गार की…" हालाँकि ये गाना मुख्या रूप से बिहार में सरकारी नौकरियों तक पहुँचने की खिंच-तान तक सिमित था, लेकिन गाने में उकेरी गयी व्यथा हर उस छात्र की है जिसका प्रतियोगी परीक्षाओं का रिजल्ट कई दिनों से ही नहीं बल्कि कई सालों से लंबित हैं। क्या इन ट्रेंड्स से ये समझा जाए की लोग अपनी नौकरियों को लेकर जागृत हो गएँ हैं? क्या लोग अब देश की गिरती अर्थव्यवस्था को लेकर भी आवाज़ बुलंद करने लगेंगे? शायद नहीं।

क्या आप जानते हैं की SSC-CGL की 2018 की परीक्षा 2019 में हुई थी और आज हम 2020 के भी नौवे महीने में खड़े हैं, पर उस परीक्षा का अभी तक कोई आता-पता नहीं है? क्या आपको याद है की साल 2018 में चारो ओर रेलवे में भरी तादात में वेकन्सी निकलने की खबर उड़ी थी? अब उसका सच भी जान लीजिए, वेकन्सी निकली, परीक्षाएं हुईं, परिणाम भी आएं, छात्र चुने भी गएँ, ट्रेनिंग भी हुई, लेकिन 2019 लोक सभा चुनाव के होते ही सब कुछ ठप्प हो गया। प्रशिक्षित छात्र अभी भी बहाली का इंतज़ार कर रहे हैं। ये तो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं या परीक्षा दे कर बीच केवल मझदार में फंसे हुए कुछ छात्रों की कहानी है। अगर इस पर गहन रिसर्च की जाए तो शायद महाभारत जैसे कितने ही ग्रंथ हमारे सामने होंगे। क्या आप इन छात्रों की "मेन्टल हेल्थ" के बारे में सोच सकते हैं? क्या आप इनके बारे में दिल से सोचना चाहते हैं? क्या आप सुशांत और रिया के चटपटे किस्सों की जगह इन छात्रों के बारे में अपनी खाने की मेज़ पर चर्चा करेंगे? ये सवाल ज़रूरी है क्यूंकि आप और हम राज्य के द्वारा बुने गए बहकावे के जाल में ऐसे फंसे हैं के हम अब अंधे हो गए हैं, हम ऐसे अंधे हुए है की हमे अब अपना भविष्य दिखना बंद हो चूका है। हमारी थाली में खाना है या नहीं इससे ज़्यादा ज़रूरी सवाल, बीते कुछ समय में, 'पड़ोसी के फ्रिज में क्या है?' बन चूका है। राज्य ने बीते कुछ सालों में हमारे चारो ओर ऐसा एक समां सा बना दिया है जिसके आगे हमारी नागरिक के रूप में सोचने और समझने की शक्ति ख़त्म होती जा रही है।

अब दौर ऐसा है की सरकार की कमियों को लोग अब "जस्टिफाई" करने लगे हैं। एक तो वेकन्सी ही न निकालना, फिर परीक्षाओं में भारी देरी करना, फिर परिणाम 2-3 साल लटका देना और फिर अगर गलती से परिणाम भी आ भी जाए तो सालों तक बहाली न होना, क्या ये सब सरकार की, राज्य की नाकामी नहीं है? इस मामले में केंद्र सरकार को अकेला कठघरे में खड़ा करना गलत होगा। राज्यों के स्तर पर भी यही हालत हैं ख़ास तौर से "हिंदी-हार्टलैंड" कहे जाने वाले राज्यों काफी ज़्यादा खस्ता हालत है। सवाल है उन राज्यों के मुख्यमंत्री क्या कर रहे हैं? क्या उन्हें ये सब नहीं दिखता? केंद्रीय स्तर पर हमारे प्रधानमंत्री क्या कर रहे हैं? क्या मोर से खेलते हुए ही सही पर उन्हें इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था की उनकी सरकार के हीं डिपार्टमेंट कई युवाओं की ज़िन्दगियों से खेल रहे हैं?

दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों का "वेल-ऑफ" क्लास ये कहता है की ये युवा मुर्ख हैं जो अपना समय यूँ गवां रहे हैं। उन्हें अपने खुद के धंधे के बारे में सोचना चाहिए। पर बात केवल इतनी सी होती तो क्या बात होती? लेकिन बात इतनी छोटी नहीं है। हमे समस्या को समझने के लिए पहले ये देखना होगा की कौन लोग इन परीक्षाओं में बैठ रहे हैं। क्या वो अम्बानी-अडानी खानदान के लोग हैं? नहीं। तो वो लोग किस सामाजिक तबके से आतें हैं? ये सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने वाले ज़्यादातर लोग माध्यम और निम्न आर्थिक तबकों से आते हैं। माँ-बाप लाखों की फ़ीस अपने बच्चो की कोचिंग में लगाते हैं की क्या पता बच्चा उनकी आर्थिक स्थिति को सुधर दे? शायद उनकी आर्थिक तंगियों से उन्हें उनके बच्चे आज़ाद कर दें। लेकिन जब सरकारी तंत्र उन लाखों-करोड़ों छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार करता है तब आपको क्या लगता है की उन छात्रों और उनके माता-पिता पर क्या गुज़रती होगी? क्या हम उनकी व्यथा का रत्ती भर भी अंदाज़ा लगा सकतें हैं? उनके ऊपर इससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ को छोड़िये, छात्रों के ऊपर इसका क्या असर पड़ता होगा? लगातार मेहनत करने और परीक्षा देने बाद, जिन पर उनके करियर का भविष्य टिका होता है, वो अंदर से काफी हद तक टूट जाते हैं। रही कुछ और करने की बात, उसके बारे में छात्र तब सोचे न जब वो अपनी योग्यता के आधार पर पास या फेल हों। बीच मझदार में बुद्धि भी उनका साथ देना बंद कर देती है। ऐसे में ऐसे ज़्यादातर छात्र अपनी योग्यता से कम आय वाली नौकरियों में जा फसतें हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तो एक बड़ा तबका सरकारी नौकरी को ही अपने जीवन का आधार मानते हैं। उन लोगो का क्या? दिल्ली में बैठे हुक्मरान बड़े आराम से युवाओं को नौकरी देने वाला बनने के ऊपर प्रवचन दे देते हैं। क्या महोदय इस बारे में कुछ बोलना चाहेंगे की क्या सरकारी नौकरी की ज़रिये सामाजिक-आर्थिक न्याय का प्रसार राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं है? अगर है तो उनकी सरकार के मंत्री यह बात किस आधार पर कहते हैं की सरकार का काम नौकरी देना नहीं है?

एक और बात, मौजूदा सरकारें बीते कल की प्रतियोगी परीक्षाओं का तो परिणाम दे नहीं सकीं, और अब आने वाले कल में सरकारी नौकरियॉं को ख़त्म करने की तैयारी भी करने लगीं हैं। भारत सरकार के वित्त मंत्रालय की ओर से हाल में आयी अधिसूचना ये बताती है की सरकार के पास पैसों की कमी है जिस कारण सरकारी नौकरियों में नए पदों को बनाने पर रोक लगा दी गयी है। अब मंत्रालय को ये भी बताना चाहिए की अगर सरकार के पास पैसों की इतनी ही कमी है तो नए संसद भवन के निर्माण के लिए पैसा कहाँ से सरकार लेन जा रही है जिसकी परियोजना को इस आर्थिक संकट के दौर में भी नहीं रोकी गयी? ऐसा नहीं है की इससे पहले की सरकारें रोज़गार के मसले पर कोई बहुत संवेदनशील थीं, लेकिन हम नयी सरकार उसी संवेदनहीनता को बनाये रखने के लिए तो नहीं लाये थें?

SSC CGL के परीक्षार्थियों को इंतज़ार करते हुए 800 से ज़्यादा दिन बीत चुके हैं।SSC की हीं खुद की हीं दूसरी परीक्षाओं का भी यही हाल है। यही हाल बैंकिंग और रेलवे परीक्षाओं का भी है। लेकिन मीडिया ने आपकी नज़रों में इन लाखों छात्रों को भी संख्या-शून्य बना दिया है। अब राज्य के इशारे पर वो आपकी ही भरी भीड़ को भी शून्य बना चूका है। अब आप चाहें लाखों की तादात में हों या करोड़ों की, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। और अब आपको खुद भी फर्क पड़ना बंद हो चूका है। तभी १२ करोड़ से ज़्यादा लोगों की संगठित और असंगठित क्षेत्रों में नौकरियां चले जाने पर भी रोज़ रात ९ बजे टीवी पर आकर चीखने वाले "सूटधारियों" को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा। हम अब सरकार से लड़ के अपने अधिकार की चीज़ मांगने की जगह सरकार की जी हुज़ूरी सी करने लगें हैं। तभी तो 2019 लोक सभा चुनाव के पहले कुछ महानुभावों ने चीख-चीख कर कहा था की वो बेरोज़गार भी रह जाए तो कोई गम नहीं। ये दिखता है की राज्य हमे अँधा बनाता जा रहा है। अब दौर ऐसा है की सरकार की कमियों को लोग अब "जस्टिफाई" करने लगे हैं। 1970 के दशक की शुरुआत से मध्य के बीच के आस-पास भी भारत की आर्थिक स्थिति आज की आर्थिक हालत से काफी मिलती-जुलती से थी। तब देश में इंदिरा गाँधी की सरकार थी। बेरोज़गारी और बढ़ी हुई महंगाई ने लोगो को सड़को पर आने पर मजबूर कर दिया था जिसके बदले में 1975 में भारत में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी। आज भी हालत कुछ वैसे ही हैं पर सड़कों पर सरकार तक अपनी आवाज़ का दम पहुँचाने वाली जनता नहीं है। कोरोना की बात हम समझ सकते हैं लेकिन क्या आज से 6 महीने पहले सब कुछ आर्थिक रूप से देश में ठीक चल रहा था? तब कितने ही लोग सड़कों पर सरकार के खिलाफ नौकरी और गिरती अर्थवयवस्था के लिए आवाज़ उठाने सड़कों पर आयें थें? और अब आप आएंगे भी नहीं। इस लेख के बाद मुझे रत्ती भर भी उम्मीद नहीं की कुछ बदलेगा क्योंकी आप लाइक और डिस्लाइक के खेल में ही उलझ कर रह गए हैं। लोकतंत्र दम तोड़ ही रहा है, आपके अंदर का नागरिक भी जल्द ही दम तोड़ देगा। अब यही "न्यू नार्मल" है।

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